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केंद्रीय राजनीति में यूपी बिहार के बाद चौधुरी बनने को तैयार असम।

अमर शर्मा

 

असम : आज से कुछ साल पहले तक असम और नार्थ ईस्ट के राज्य पिछड़े और गरीब राज्यों में गिने जाते थे। बाहर के लोग असम को जादूटोना वाला जंगल और पहाड़ से भरा राज्य मात्र समझते थे। पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों को तो कोई पूछता भी नहीं था। इन जनजातीय लोगों को चाइनीज कह कर उपहास उड़ाया जाता था। ईटानगर, कोहिमा इम्फाल जैसे राजधानियों को तो लोग जानते भी नहीं थे। हाँ शिलॉन्ग और अगरतला कुछ हद तक लोगों के लिए जाना पहचाना सहर था लेकिन एक हील स्टेशन के तौर पर। असम के पॉलिटिशियन दिल्ली के सरकार के लिए मानो भिखमंगों की टोली थी। असम को असम का हिस्सा देना तो दूर विकास के नाम पर जो अनुदान दिए जाते थे मानों केंद्र का अनुदान नहीं भीख दे रहे हो। सं 62 के युद्ध में तो हमारे प्रधान मंत्री ने पूर्वोत्तर को छोड़ ही दिए थे। उनके लिए पूर्वोत्तर, भारत का सम्मान नहीं सिर्फ जमीन का एक जंगली इलाका हुआ करता था। शायद यह एक प्रमुख कारण रहा था की पूर्वोत्तर में अलगाववाद की बीज पनपी। असम वर्षों तक कई आंदोलनों के आग में जला। वावजूद इसके केंद्र में सबसे ज्यादा शासन करने वाली कांग्रेस सरकार हमेसा ही असम और पूर्वोत्तर को गरीब जाहिल बेरोजगार आराम फरामोस नजाने किन किन नज़रों से देखती रही। यहाँ तक की असम के पॉलिटीशियनो की औकात बताने के लिए अपने कुत्तों को ज्यादा तवज्जो देते थे। लेकिन असम के लोग भारत के सभी राज्यों से ज्यादा देश प्रेमी है। अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम किसी समाज में सबसे ज्यादा है तो वो असम के असमिया समाज में ही है। मैं इस बात की दवा इसलिए कर रहा हुं क्यों कि मैंने इसी असम में रह कर दिल से महसूस किया है।

लेकिन कब तक केंद्र की अनदेखी सहते। समय बदला। सत्ता बदली लोगों की सोच बदली तो असम कैसे पीछे रहता। अपने को देश में सबसे आगे रखने की चाहत और वर्षों से दिल्ली द्वारा दबे रहने की कसक राज्य के देश भक्तों को शांत नहीं रहने दिआ। कभी असम को दुधारू गाय की संज्ञा दी जाती थी। चुटकुले और कटाक्ष रखे जाते थे की असम एक दुधारू गाय है जिसका अगला हिस्सा असम में और पिछले यानि थन वाला हिस्सा दिल्ली में होता है। असम के लोग इस गाय रूपी असम को अपने मेहनत से खूब खिलते है और दिल्ली वाले इसे बेरहमी से दुहते है। लेकिन 2014 के बाद सोच में परिवर्तन आया। केंद्र ने असम को तबज्जो देना सुरु किया। इस राज्य को गरीब और जाहिलों का नहीं बीर मेहनतकश और पढ़ेलिखे लोगों का समाज के रूप में देखा और साथ साथ ये भी महसूस किया की इनके साथ वर्षों से अन्याय हुवा है। असम को मदद नहीं भीख दिआ जा रहा था। असम को उसके हक़ देने के तरीके बदले नजरिया बदली। दिए गए फण्ड के हिसाब लेने के तरीके बदले। केंद्रीय योजनाओं के सीधे एंट्री हुई। अंतरराष्ट्रीय सीमावर्ती राज्य होने के नाते पूर्वोत्तर की अहमियत को समझी गयी। दक्षिण एशिया वाले आर्थिक गलियारे की मुख्य द्वार वाली छवि को महसूस किया गया। और जो पूर्वोत्तर में विकार की गति पकड़ी तो अरुणाचल प्रदेश में चीन के सीमा के चारो रतफ ऐसा सड़क का जाल बनना सुरु हुआ की अरुणाचल कोई पहाड़ी क्षेत्र न हो कर मैदानी राज्य हो। अरुणाचल के जो लोग 9000 फीट के ऊंचाई पर स्थित हपोली और ज़ीरो जैसे जगह पर सिर्फ तीन मिटर चौड़ी सड़क बो भी टूटीफूटी के सहारे आनेजाने को मजबूर थे। इसके आगे का सफर तो साल 2008 तक पैदल ही तय किया जाता था और अब चीन के सीमा तक सडको का जाल बिछ चूका है। हर तरफ चार लेन वाली एक्सप्रेस हाइवे बन चुके है। अरुणाचल के इस पार से उस पार जाने के लिए कई विश्वस्तरीय पुलबन चुके है जिसमे ब्रह्मपुत्र पर बना ढला-सादिया और बोगिबिल प्रमुख है। अरुणाचल के राजधानी ईटानगर और त्रिपुरा के राजधानी अगरतला को रेल नेटवर्क से जोड़ा गया। अरुणाचल में होलांगी इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसे अभूतपूर्व तोफे मिले। तेजू में सैन्य अड्डा बना, असम के कई इलाकों में स्थित छोटी लाइन को हटाकर बड़ी लाइन के जरिए देश के मुख्या गति के साथ जोड़ने का काम हुआ। असम के रेल नेटवर्क को बिजली से जोड़ने का काम चरम पर है। सड़कों को एक्सप्रेस हाईवे में बदला जा रहा है। शहरों को डिजिटल रूप दिया जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन लाया जा रहा है। मतलब विकास मानो राजधानी ट्रैन के गति से दौड़ रही है। इसमें असम के दो प्रखर और काबिल पॉलिटीशियनो का खास भूमिका है। जिनमे पहला “जातिर नायक” कहे जाने वाले असम के पूर्व मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल और हमेसा से ही कुशल राजनीतिज्ञ माने जाने वाले वर्त्तमान के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा। इन दोनों राजनीती के खिलाडियों को जैसे मौका मिला चौके पार चौके जड़ते चले गए और एक प्रधान मंत्री का चहेता बन पुरे देश में अपना सेवा देने में लग गया तो वही दूसरा मोदी शाह व संघ तीनो का लाडला बन राज्य में परिवर्तन का मुशालाधार वारिस ही कर दी । हिमंत विश्व आज देश में नम्बर दो पर पहुँच उत्तर प्रदेश के जोगी को ही टक्कर दे रहे हैं। कभी उत्तर प्रदेश को राजनीती का प्रवेश द्वार और दिल्ली तक पहुँचाने का एकमात्र गलियारा माना जाता था लेकिन आज पूर्वोत्तर इस मामले में उत्तर प्रदेश को कड़ा टक्कर दे रहा है। महाराष्ट्र का सत्ता परिवर्तन हो या बंगाल के राजनीती में सेंध लगाना आज केंद्र उत्तर प्रदेश से ज्यादा असम को तवज्जो दी जा रही है और इसलिए असम आज आर्थिक सांस्कृतिक राजनीतिक चाहे जो भी क्षेत्र हो देश को दिशा निर्देश करने की ओर तेजी से आगे आ रहा है। शायद यही वजह की आज लोग ये कहने पर मजबूर हो रहे है कि असम केंद्रीय राजनीति में चौधरी बनने की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश में लोगों के बीच ये चर्चा आम है कि सीएम हो तो असम और यूपी जैसे। औरों का तो मुझे नहीं मालूम लेकिन एक दिन असम के ये दो लाल में से एक पीएम और दूसरा राष्ट्रपति के कुर्सी तक पहुंचते हुए मै साफ देख रहा हूँ। अगर ऐसा हुआ तो बो दिन मेरे जीवन का सबसे उज्वल दिन होगा और भारत एक नए आयाम पार पहुंचेगा।

असम अनपढ़ जाहिल वनवासियों का भूमि नहीं, असम कामदेव का तपोभूमि ऋषि वसिष्ठ का कर्म भूमि है। मां कामाख्या, देवी रुक्मिणी, हिडिम्बा घटोत्कच्छ बर्बरीक नरकासुर जैसे वीरों का भूमि रहा है। सृष्टि के आदि में जहाँ ब्रह्मा ने अंतरिक्ष में स्थित तारों की रचना की वो प्राग्ज्योतिषपुर है असम। लाचित जैसे वीरों की भूमि है असम। इसे कुंठित और लाचार बना कर रखा गया था। असम और पूर्वोत्तर के बिना भारत की कल्पना एक छलावा मात्र है। ( इस लेख में जहां जहां असम शब्द है उसका तात्पर्य “बर असम” यानि पुरे पूर्वोत्तर के तत्कालीन अखंड असम से है)

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