प्रयागराज – उत्तर प्रदेश।
■7 किलोवाट-पीक क्षमता वाले रूफटॉप सोलर सिस्टम से स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन, कोच की विद्युत सेवाओं की विश्वसनीयता में होगा सुधार
भारतीय रेलवे ने हरित और पर्यावरण-अनुकूल रेल संचालन की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। उत्तर मध्य रेलवे के प्रयागराज मंडल में सौर ऊर्जा से सहायता प्राप्त यात्री कोच का प्रदर्शन किया गया है। इस पहल के माध्यम से पारंपरिक रेलवे कोचों में नवीकरणीय ऊर्जा तकनीक को शामिल कर ऊर्जा दक्षता बढ़ाने का प्रयास किया गया है।
●पारंपरिक तरीके से बिजली कैसे पैदा होती है?
वर्तमान में आईसीएफ (ICF) यात्री कोचों में विद्युत ऊर्जा का उत्पादन मुख्य रूप से कोच के नीचे लगाए गए एक्सल-चालित अल्टरनेटर के माध्यम से किया जाता है। यह अल्टरनेटर बेल्ट व्यवस्था के जरिए कोच के पहिए के एक्सल से जुड़ा होता है और ट्रेन के चलने पर यांत्रिक ऊर्जा से बिजली उत्पन्न करता है।
यह बिजली कोच की बैटरी बैंक को चार्ज करने के साथ-साथ यात्रियों के लिए उपलब्ध लाइट, पंखे और मोबाइल चार्जिंग जैसी सुविधाओं के संचालन में उपयोग की जाती है। हालांकि यह व्यवस्था दशकों से भारतीय रेलवे में प्रभावी ढंग से काम कर रही है, लेकिन यह ट्रेन की गति और आवाजाही पर निर्भर रहती है तथा इसमें यांत्रिक और विद्युत ऊर्जा के रूपांतरण के दौरान कुछ ऊर्जा हानि भी होती है।
●कैसे काम करेगा सौर ऊर्जा वाला कोच?
सौर ऊर्जा से सहायता प्राप्त यह कोच पारंपरिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में सामने आया है। कोच की छत पर लगाए गए उच्च दक्षता वाले सोलर फोटोवोल्टिक पैनल सूर्य के प्रकाश से सीधे बिजली उत्पन्न करेंगे। यह बिजली कोच के बैटरी बैंक को चार्ज करने में सहयोग करेगी।
दिनभर उपलब्ध सौर ऊर्जा का उपयोग करने से कोच की बिजली जरूरतों के लिए पारंपरिक एक्सल-चालित बिजली उत्पादन पर निर्भरता कम होगी। इससे ऊर्जा के बेहतर उपयोग के साथ-साथ विद्युत व्यवस्था की दक्षता में भी सुधार होगा।
पायलट प्रोजेक्ट के तहत इस कोच की छत पर लगभग 7 किलोवाट-पीक (7 kWp) क्षमता का सोलर सिस्टम लगाया गया है। इससे कोच की विद्युत जरूरतों को पूरा करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन किया जाएगा।
●हर साल करीब 13,400 यूनिट बिजली और ₹2.80 लाख की बचत
रेलवे के अनुसार, यह रूफटॉप सोलर प्लांट सालाना लगभग 13,400 यूनिट (kWh) स्वच्छ बिजली पैदा करेगा। इससे प्रत्येक कोच पर हर साल करीब ₹2.80 लाख की बचत होने का अनुमान है।
इसके साथ ही यह प्रणाली प्रत्येक कोच से सालाना लगभग 11 टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन कम करने में भी मदद करेगी।
फिलहाल इस सौर ऊर्जा प्रणाली को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर एक आईसीएफ नॉन-एसी कोच में लगाया गया है। इसके प्रदर्शन और परिणामों का आकलन करने के बाद इस तकनीक को चरणबद्ध तरीके से अन्य यात्री कोचों में भी लागू करने की योजना है।
●हरित रेलवे की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
यह परियोजना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पारंपरिक कोचों में बिजली उत्पादन के लिए ट्रेन की गति से प्राप्त यांत्रिक ऊर्जा पर निर्भर रहना पड़ता है। वहीं, सौर ऊर्जा प्रणाली कोच की छत पर उपलब्ध सूर्य के प्रकाश का सीधे उपयोग कर बिजली पैदा करती है।
यह पहल दिखाती है कि पारंपरिक रेलवे कोचों को भी आधुनिक नवीकरणीय ऊर्जा तकनीक के माध्यम से अधिक ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण-अनुकूल बनाया जा सकता है।
यह परियोजना भारतीय रेलवे की हरित पहल, तकनीकी नवाचार और ऊर्जा संसाधनों के कुशल उपयोग के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। पायलट प्रोजेक्ट से प्राप्त अनुभव भविष्य में यात्री कोचों में नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों के व्यापक इस्तेमाल के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करेगा।
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