कोलकाता – पश्चिम बंगाल।
कल्पना कीजिए कि आप एक तेज़ रफ्तार एक्सप्रेस ट्रेन में सफर कर रहे हैं और खिड़की के बाहर अंधेरे में डूबे दृश्य तेज़ी से पीछे छूट रहे हैं। आप अपने परिवार के साथ लंबे समय से प्रतीक्षित छुट्टियाँ मनाने जा रहे हैं और सभी गहरी नींद में सो रहे हैं। रात का भोजन करने के बाद अचानक आपको सिगरेट पीने की इच्छा होती है। आप घड़ी देखते हैं – रात के लगभग 1:00 बजे हैं। आप स्वयं को यह सोचकर समझा लेते हैं कि पूरे डिब्बे में सभी सो रहे हैं, इसलिए किसी को पता नहीं चलेगा। आप शौचालय में जाते हैं, जेब से सिगरेट निकालते हैं और लाइटर जलाते हैं। लेकिन जैसे ही सिगरेट का सिरा सुलगता है, आपकी पूरी दुनिया पल भर में बदल जाती है।
अचानक ट्रेन तेज झटके के साथ रुक जाती है। पूरे डिब्बे में फायर अलार्म की तेज़ आवाज़ गूंज उठती है। कुछ ही मिनटों में रेलवे सुरक्षा बल और ट्रेन में मौजूद टिकट जाँच कर्मचारी आपके शौचालय तक पहुँच जाते हैं। देखते ही देखते परिवार के साथ बिताई जाने वाली सपनों की छुट्टियाँ एक भयानक दुःस्वप्न में बदल जाती हैं। एक छोटे-से, लेकिन अत्याधुनिक स्मोक डिटेक्टर ने आपको पकड़ लिया। आपकी एक क्षणिक लापरवाही ने न केवल आपके परिवार की खुशियाँ, बल्कि आपकी मेहनत की कमाई और सामाजिक प्रतिष्ठा को भी राख में बदल दिया। यह केवल एक काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि रेल पटरियों पर हर दिन घटित होने वाली एक कठोर वास्तविकता है।
ट्रेनों, रेलवे स्टेशनों या रेलवे परिसर में कहीं भी धूम्रपान करना केवल एक बुरी आदत नहीं, बल्कि एक बड़ी दुर्घटना को खुला निमंत्रण देना है। ट्रेन एक तेज़ गति से चलने वाला बंद वातावरण है। सिगरेट की एक छोटी सी चिंगारी या लापरवाही से फेंका गया जलता हुआ टुकड़ा कुछ ही क्षणों में पूरे कोच को भीषण आग की चपेट में ले सकता है। ऐसी स्थिति में आपातकालीन निकास बाधित हो सकते हैं और सैकड़ों निर्दोष यात्रियों का जीवन जहरीले धुएँ से खतरे में पड़ सकता है। इतिहास ऐसे अनेक दर्दनाक हादसों का गवाह है, जहाँ एक छोटी-सी चिंगारी ने विकराल आग का रूप लेकर अनेक निर्दोष लोगों की जान ले ली।
इसी खतरे को पूरी तरह समाप्त करने के उद्देश्य से पूर्व रेलवे अपने महाप्रबंधक मिलिंद देऊस्कर के सक्रिय नेतृत्व में अपने पूरे क्षेत्राधिकार में व्यापक सुरक्षा अभियान चला रहा है। प्रत्येक यात्री की सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करने के लिए पूर्व रेलवे ने धूम्रपान के प्रति ‘शून्य सहिष्णुता’ नीति अपनाई है। ट्रेनों के शौचालयों एवं कोचों में अत्याधुनिक स्वचालित स्मोक डिटेक्टर तेजी से लगाए जा रहे हैं। इसके साथ ही रेलवे स्टेशनों और परिसरों में सीसीटीवी कैमरों का व्यापक नेटवर्क तथा रेलवे सुरक्षा बल की चौबीसों घंटे सतर्क गश्त के माध्यम से नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है।
इसके कानूनी परिणाम भी अत्यंत गंभीर और महंगे होते हैं। रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 167 के तहत ट्रेन, रेलवे स्टेशन अथवा रेलवे परिसर में धूम्रपान करते हुए पकड़े जाने पर कड़ी कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। दोषी व्यक्ति पर ₹2,000 तक का जुर्माना, ट्रेन के डिब्बे से तत्काल उतारे जाने की कार्रवाई तथा उसके यात्रा टिकट या पास की जब्ती जैसी सख्त कार्रवाई की जा सकती है। भारी आर्थिक दंड और यात्रा बाधित होने के अलावा, ऐसे व्यक्ति पर सैकड़ों निर्दोष यात्रियों के जीवन को खतरे में डालने का सामाजिक कलंक भी लगता है।
पूर्व रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी शिबराम माझी ने कहा, “रेल यात्रा आपसी विश्वास और साझा जिम्मेदारी पर आधारित होती है। जब कोई यात्री ट्रेन के भीतर सिगरेट जलाता है, तो वह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि अपने साथ यात्रा कर रहे बच्चों, महिलाओं और अन्य यात्रियों के जीवन को भी जोखिम में डाल देता है। हमारी सुरक्षा व्यवस्था पहले से कहीं अधिक सशक्त और सतर्क है तथा नियम तोड़ने वालों पर अधिकतम जुर्माना और कठोर कार्रवाई करने में कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी। हम सभी यात्रियों से अपील करते हैं कि वे अपनी लत से ऊपर उठकर मानव जीवन को प्राथमिकता दें और भारतीय रेल को सुरक्षित एवं धूम्रपान-मुक्त बनाए रखने में हमारा सहयोग करें।”
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