दक्षिण 24 परगना – पश्चिम बंगाल, बात हिन्दुस्तान की।
स्कूल जाने के लिए सड़क नहीं, भरोसा सिर्फ केले की नाव (केले के तने से बनी बेड़ा)! साल के करीब छह महीने स्कूल तक जाने वाली सड़क पानी में डूबी रहती है। बारिश के मौसम में स्थिति और भी भयावह हो जाती है। ऐसे में मजबूर होकर मथुरापुर के तेंतुलबेड़िया अवैतनिक प्राथमिक विद्यालय के छोटे-छोटे बच्चे केले की नाव पर सवार होकर स्कूल पहुंचते हैं।
स्कूल के सामने की सड़क पानी में डूबी रहने के कारण कई बच्चे डर के चलते स्कूल जाना ही नहीं चाहते। मजबूरी में अभिभावक अपने बच्चों का हाथ पकड़कर पानी पार कर स्कूल तक पहुंचाते हैं। कई बार बड़े बच्चे छोटी उम्र के बच्चों को केले की नाव के सहारे पानी पार कराते हैं। अगर कोई बच्चा पानी में गिर जाए, तो उस दिन उसकी पढ़ाई भी बंद हो जाती है।
सिर्फ आने-जाने की समस्या ही नहीं, बल्कि स्कूल की जर्जर इमारत भी चिंता का विषय बनी हुई है। भवन का एक हिस्सा टूटकर गिर चुका है। इसके चलते महज एक कमरे में किसी तरह पढ़ाई चल रही है। वहीं, स्कूल में लगा पेयजल का नलकूप भी खराब पड़ा है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पिछले करीब आठ वर्षों से यह समस्या बनी हुई है। कई बार प्रशासन को इसकी जानकारी देने के बावजूद अब तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ है। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में दिन-ब-दिन स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या भी कम होती जा रही है।
स्कूल की शिक्षिकाओं ने प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द स्कूल तक जाने वाली सड़क की मरम्मत कराई जाए, जर्जर भवन की मरम्मत हो और बच्चों के लिए पेयजल की समुचित व्यवस्था की जाए।
जिस स्कूल में कभी इलाके के बड़ी संख्या में लोगों ने शिक्षा हासिल की थी, आज उसी स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों के लिए स्कूल पहुंचने का एकमात्र सहारा केले की नाव बनी हुई है। सवाल उठ रहा है—आखिर कब तक इन मासूम बच्चों को पानी पार करके स्कूल जाना पड़ेगा?
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