बेलूड़ – हावड़ा – पश्चिम बंगाल, बात हिन्दुस्तान की।
भागीरथी के तट पर भक्ति और भावनाओं का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। समय मानो सवा सौ वर्षों की गौरवशाली परंपरा के ऐतिहासिक पड़ाव पर ठहर गया है। आज, 19 अक्टूबर को महाष्टमी के पावन अवसर पर बेलूड़ मठ की ऐतिहासिक दुर्गापूजा ने अपने 125वें वर्ष में प्रवेश किया। वर्ष 1901 में महाषष्ठी के दिन युगनायक स्वामी विवेकानंद के हाथों जिस आध्यात्मिक महायज्ञ की शुरुआत हुई थी, वह आज 2026 में एक विशाल परंपरा का रूप ले चुका है। सुबह से ही मठ परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। दूर-दराज से पहुंचे लाखों भक्तों की मौजूदगी में गंगा घाट पर जनसैलाब का दृश्य देखने को मिला।
सुबह नौ बजे के बाद मठ के मुख्य मंदिर के पास बने विशाल मंडप में पूजा का मुख्य आकर्षण कुमारी पूजा आयोजित की जा रही है। शास्त्रीय परंपराओं के अनुसार सजाए गए आसन पर विराजमान एक बालिका का साक्षात ब्रह्ममयी स्वरूप मानकर वरिष्ठ संन्यासी और महाराज पूजा-अर्चना कर रहे हैं।
स्वामी विवेकानंद की ऐतिहासिक परिकल्पना को याद करते हुए मठ के एक वरिष्ठ संत ने बताया, “श्रीरामकृष्ण कहते थे कि निष्कलुष बालिकाएं सांसारिक नकारात्मक शक्तियों से दूर रहती हैं। उनके भीतर शुद्ध मातृभाव निहित होता है। स्वामीजी ने इसी जीवंत दिव्य स्वरूप की अवधारणा को बेलूड़ मठ में स्थापित किया था।”
मठ की परंपरा के अनुसार, एक से 16 वर्ष तक की बालिकाओं में से कुमारी का चयन किया जाता है। इस वर्ष दुर्गापूजा के 125वें वर्ष के विशेष अवसर पर सदियों पुरानी इस परंपरा के तहत कुमारी की पूजा ‘उमा’ के रूप में की जा रही है।
आज सुबह 5 बजकर 40 मिनट पर मंगल आरती और महास्नान के साथ उत्सव की शुरुआत हुई। कुमारी पूजा के बाद सुबह 10 बजकर 28 मिनट से 11 बजकर 16 मिनट तक के शुभ मुहूर्त में अत्यंत पवित्र संधि पूजा आयोजित होने वाली है। इस विशेष क्षण के साक्षी बनने के लिए मंडप में मौजूद हजारों श्रद्धालु उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं।
●श्री मां शारदा का अहिंसा संदेश और महाभोग की भव्य व्यवस्था
बेलूड़ मठ की दुर्गापूजा की एक प्रमुख विशेषता इसका अहिंसक स्वरूप है। श्री मां शारदा देवी की इच्छा और पशुबलि के प्रति उनकी आपत्ति को ध्यान में रखते हुए यहां पशुबलि की परंपरा नहीं है। इसके स्थान पर फल और सब्जियां अर्पित कर प्रतीकात्मक बलि की रस्म पूरी की जाती है।
मठ के एक वरिष्ठ संन्यासी ने कहा, “स्वामीजी द्वारा शुरू की गई यह पूजा केवल कर्मकांड पर आधारित धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि सामाजिक नवजागरण का एक बड़ा प्रतीक है, जहां जाति, धर्म और वर्ण का कोई भेदभाव नहीं है।”
सामाजिक समरसता की इस भावना का सबसे बड़ा उदाहरण मठ की भोगशाला है। देवी की भोग आरती और श्रद्धालुओं की पुष्पांजलि के बाद करीब 30 हजार दर्शनार्थियों के लिए तैयार की गई सुगंधित खिचड़ी भोग का वितरण शुरू होने वाला है।
●डिजिटल युग में आधुनिक तकनीक और पूजा का सीधा प्रसारण
विशाल भीड़ को नियंत्रित करने और उत्सव को व्यवस्थित बनाए रखने के लिए मठ प्रबंधन ने आधुनिक तकनीक का भी सहारा लिया है। मंडप के सामने बने विशाल बैठने के क्षेत्र के अलावा मठ के विभिन्न महत्वपूर्ण स्थानों पर बड़ी-बड़ी स्क्रीन लगाई गई हैं। इससे पीछे खड़े श्रद्धालु भी कुमारी पूजा के दर्शन कर सकते हैं।
इसके साथ ही, दुनिया भर में फैले श्रद्धालुओं तक पूजा पहुंचाने के लिए बेलूड़ मठ के आधिकारिक यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया हैंडल पर पूजा का सीधा प्रसारण किया जा रहा है।
●अगले दो दिनों का पूजा कार्यक्रम
महाष्टमी के धार्मिक अनुष्ठानों और शाम की आरती के बाद अगले दिन, 20 अक्टूबर (मंगलवार) को सुबह 5 बजकर 40 मिनट पर महानवमी की पूजा शुरू होगी। इस दिन सुबह विशेष हवन और यज्ञ मुख्य आकर्षण होंगे।
इसके बाद 21 अक्टूबर (बुधवार) को विजयादशमी के अवसर पर दर्पण विसर्जन और प्रतिमा विसर्जन के साथ बेलूड़ मठ की दुर्गापूजा की 125 वर्षों की इस ऐतिहासिक परंपरा का एक और अध्याय संपन्न होगा।
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